Friday, May 11, 2012

दिल्ली लाइव :- दिल्ली है दिलवालों की....



दिल्ली की सडकों से गुजरते हुए ये बातें दिमाग में चलने लगती हैं कि " दिल्ली है दिलवालों की "......पर लगता नही है ...क्यूंकि अगर ऐसा होता तो जरुर ही कहीं ना कहीं कोई दिलवाली मिल ही जाती......लेकिन अच्छे -अच्छे का गफलत और दिलवाला बुखार मिनट में उतर जाता है ..कभी खुबसूरत सी बदमिजाज सी  कन्याएं उतर देती हैं तो कभी कभी पुलिसिया डर... खैर बात करते हैं दिल कि और दिलवालों कि..तो आप किसी से भी पूछ लीजिये कि फलां आदमी का घर बता सकते हैं ,..तो उनको खूब अच्छे से जानने वाले लोग भी आपके पूछना खतम होने से पहले ही कहेंगे..हमे नही पता ..अब भाई इतना डेयरिंग काम तो बड़े दिलवाले ही कर सकते हैं ना !! और तो और किसी मुह्ह्ले में जाके पूछिये  ये कौन सा मुहल्ला है तब भी भी वही जवाब मिलेगा हमे नही पता ...एक आध बार तो रिस्क लेके हमने ये पूछा कि आपके पिता जी का नाम क्या है, इस बार भी हमारे सवाल से पहले वही जवाब मिला !!! धन्य है दिल्ली !.... .. आपको एड्रेस जानना है तो कहीं भी किसी रिक्शे वाले से ना पूछें वरना ऐसे बता देगा कि आनन्द विहार से  से  लक्ष्मीनगर जाना है तो आपको पहले द्वारका जाके वहीं ए मेट्रो पकड़ना होगा !! हो गया फिर तो दिल्ली का सैर ...हालाँकि मोबाइल में मैप  और दस रूपये में बिक्कता हुआ मैप  थोडा बहुत हेल्प जरुर करता है ....................हाँ एक आध ऑटो वाले या फिर बाहर से आये लोग आपको एड्रेस बता सकते हैं या फिर किसी दुकान से अगर दस रूपये से अद्धिक का सामान  खरीदें तो वो भी !!!!कहने का मतलब की यहाँ रहना है तो मजबूत दिल का होना जरूरी है ताकि अपने दिल में कोई एड्रेस छिपा के रहा जा सके या कहीं किसी मुह्ह्ल्ले में बगल के घर में रहने वाले मिश्र जी को ढूंढने के लिए कई मिसराइनों से पंगा लेना पड़े !!
तो जी अब इतने मजबूत दिल वालों का शहर है तभी तो कहा जाता है दिल्ली है दिलवालों की !!!!

Thursday, March 29, 2012

नारी खुद से हारी !

 
ताजुब करने की वैसे तो बात नही है,  लेकिन पुरुष जब माडर्न बनके दिखाना चाहता है तो वो ज्यादा से ज्यादा कपड़े पहनने लगता है जैसे कोट, पैंट ,टाई ,और जब स्त्रियाँ माडर्न बनने लगती  हैं तो कपडे कम होते जाते हैं , और उनका तर्क होता है कि कपडे तो अपनी मर्जी से पहने जाने कि चीज है ,लोगों को इससे समस्या नही होनी चाहिए., और कपड़ों का सोच से क्या लेना देना ....लेकिन क्या ऐसी स्वघोषित  महादेवियों को ये समझ में नही आता कि चालाक पुरुष कभी किसी चलचित्र में सामने रूप से  खुद को हाफ पैंट में भी नही दिखाता जबकि इनको बिकिनी में पेश करता है, मानो वो  फिल्मे  बेचने का रैपर हों ....  ,और ये खूब इतराती हैं. कि उनके जैसा कमनीय शरीर किसी के पास नही है, जबकि ऐसा करके वो इसकी कीमत घटा ही रही होती हैं...अमूल्य निधि चंद लाखों में बिक के रह जाती है  ....... अब अपने आप को महान मानने वाली स्त्रियाँ खुद को बेवकूफ साबित कर रही हैं या चालाक ये तो वही जाने ...लेकिन सम्मान चाहिए तो सामान कि  तरह पेश आने  से ऊपर उठना होगा .......... और दूसरी बात ....
और कुछ लेखिकाएं भी जब कुछ खास नही  लिख पाती हैं तो उन्हें स्त्री-शरीर का वर्णन  ज्यादा आसान लगता है प्रसिद्धी   पाने के लिए .....वो दिखाती हैं कि अमुक स्त्री के पति ने उसे कैसे नोचा खसोटा ..उसके शरीर के किस भाग पर उसने क्या प्रहार किया आदि आदि .... और इन लेखिकाओ के लेखन में कहीं भी स्त्री को मजबूत बनाने कि कोशिश नही दिखती..बस उसकी कमजोरी का गुणगान ही दीखता है ..जो कि निश्चित रूप से स्त्री को और कमजोर ही बना रही है ..हाँ एक बात है ऐसा लिख के ये लेखिकाएं अपनी बिकी पुस्तकों कि संख्या जरुर बढ़ा ले रही हैं , या फिर किसी साहित्य के मंच पर किसी नारी विमर्श  लिखने के लिए सम्मानित हो जाती हैं...जबकि बाकी  नारी के ऊपर इस साहित्य का असर कुछ नही होता,  हाँ वो अगर इस पढ़ती है तो खुद पर ग्लानि ही महसूस करती है............
 
ऊपर दो बातें नारी के दो रूप को दर्शाती हैं लेकिन कहीं न कहीं दोनों एक दुसरे से जुडी हैं .!! और पुरुष का दर्शक बने रहना कहीं न कहीं उसे दोषी भी बनाता है !